शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2020

बुझ गए हैं कई घरों के चिराग ए रोशन... और सियासत दावा कर रही है बिजली मुफ्त है...



बुझ गए हैं कई घरों के चिराग ए रोशन... और सियासत दावा कर रही है बिजली मुफ्त है

दिल्ली दहल उठी... हिंसा हुई और फिर ये हिंसा तब्दील हो गए दंगों में... राजधानी दिल्ली के कई इलाके दंगों की चपेट में आ गए... और दूसरे शहरों से उन रिहाइश के लिए फोन आने लगे जो काम की तलाश में दिल्ली में आए थे लेकिन दंगों में फंस गए... दंगों के दिन भी बहुत से लोगों ने काम पर जाने की कोशिश की... बहुत से लोग अपने-अपने दफ्तरों के लिए निकलना भी चाहते थे... लेकिन जहां तहां फंस गए... खैर ये तो उस वक्त के हालात थे जब दंगा भड़का और जहां-तहां भाग रहे लोगों की जान चली गई... एक हेड कांस्टेबल को अपनी जान गंवानी पड़ी... और आईबी के एक अधिकारी को भी जान से हाथ धोना पड़ा... कई दर्जन गई जानों का ज़िम्मेदार आखिर कौन है... शायद आपका भी यही जवाब होगा कि इन ज़िंदगियों का ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ ओछी राजनीति ही है... जो ना अपना देखती है और ना पराया देखती है... जो ना छोटा देखती है और ना ही बड़ा... जो ना महिलाओं को देखती है और ना ही पुरुषों को क्योंकि राजनीति तो सिर्फ करने का नाम है... और इस राजनीति को खून से रंग दिया गया... राजधानी दिल्ली में चुनावों के दौरान मुफ्त शब्द को एक खूब भुनाया गया तो सीएए और एनआरसी के बहाने मुस्लिम बहनों को घर से बाहर निकालकर उन्हे सड़क का रास्ता दिखाते हुए रास्ते में ही बैठा दिया है... आपने बिल्कुल ठीक समझा... यहां बात शाहीन बाग की हो रही है... फिर वारिस पठान जैसे सियासतदानों या फिर यूं कहें कि कुछ ऐसे चुने हुए नेता जिनके चलते राजनीति ओछी हो चली है... उनकी धमकियों ने एक चिंगारी को धधका दिया... और आग ऐसी भड़की जिसने राजधानी दिल्ली को अपनी चपेट में ले लिया... अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्रपति राजधानी दिल्ली में था... न्यूज चैनल्स की आधी स्क्रीन पर एक तस्वीर में ट्रंप और मोदी नज़र आ रहे थे... दिल्ली मदकती दिखी... तो आधी स्क्रीन में धधकती दिल्ली दिखाई दी... देश का दिल है दिल्ली जहां हुए दर्द ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है... हालात ये हो गए कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ही पार्टी के एक सदस्य जो कि पार्षद हैं... उनपर शक की सुई आकर रुक गई और उनकी संदिग्ध भूमिका की जांच की जा रही है... क्योंकि कई ऐसे विडियो वायरल हुए जिनमें पार्षद महोदय के निर्माणाधीन घर की छत दिखी... उस छत पर वो भी दिखे और उनके साथ कई युवा अपना मुंह ढंके हुए... इस हिंसा के दो दिन बाद जब पूरी मीडिया और स्थानीय लोगों ने इस घर को छान मारा...तब जाकर फोरेंसिक टीम पहुंची सबूतों को इकट्ठा करने... खैर ये रवैया सबसे सामने धीरे-धीरे सामने आ रहा है लेकिन ये सच है कि एक दूसरे पर ज़िम्मेदारी थोपने की बजाय उन घर के हालातों के बारे में सबसे पहले सोचा जाना चाहिए... जिन्होने अपने घरों के चिरागों को बुझते देखा है... नाउम्मीदी इनके दामन में हमेशा-हमेशा के लिए आकर सिमट गई... ऐसे में सियासी बेरूखी इन लोगों को तोड़कर रख देगी क्योंकि अब ये जख्म शायद ही भरें जो फरवरी 2020 में इन परिवार वालों को मिले हैं... राजधानी दिल्ली की आंखों में आंसू हैं और लम्हों में हुई खता की सजा अब सदियों तक मिलती रहेगी.,.,,      























गुरुवार, फ़रवरी 13, 2020

दिल्ली चुनाव 2020... मायने क्या ?


दिल्ली चुनाव 2020 से क्या सीख मिली ?
जीत से सीख तो हार से सबक मिलता रहा है... खैर सबक तो जीत से मिलता है लेकिन जीतने वाले को नहीं... यहां दिल्ली चुनाव 2020 के परिणामों के मायने बहुत स्पष्ट हैं... आम आदमी पार्टी को कुछ सीटों का नुकसान तो हुआ लेकिन ये नुकसान उन्हे सरकार बनाने से नहीं रोक पाया... इसके इतर बात करें बीजेपी की तो उसे 4 सीटों का तो फायदा हुआ है लेकिन ये फायदा उनके मनोबल को सींचने के अलावा शायद ही कुछ और कर सका है और ये सिंचाई भी बहुत कम पानी से हो सकी है... जो अगले 5 साल तक होती रहेगी... लेकिन विपक्ष के तौर पर बीजेपी को अहम भूमिका निभाते रहते हुए केजरीवाल सरकार के सही और गलत के बीच के फर्क को समझाते रहना होगा लेकिन अगले पांच साल जितने अहम् केजरीवाल सरकार के लिए होंगे उतने ही अहम बीजेपी के लिए होंगे,.,., क्योंकि अगले विधानसभा चुनाव होने हैं बंगाल और बिहार में... बंगाल की ममता सरकार की बात करें तो विपक्षियों पर वो कतई ममता नहीं दिखाती हैं और वो बंगाल की कठोर सड़क पर पैदल मार्च करके ही सरकार के कठोर रवैये की बानगी पेश कर देती हैं... यानि बंगाल में सियासी कीचड़ के अलावा बीजेपी को कठोर और पथरीली राजनीति से भी टकराना होगा... यानि कमल को खिलाने के लिए यहां पर बीजेपी की कोशिशें धरातल पर मजबूत दिखनी ही होंगी... बिहार में तो नीतीश सरकार का रवैया किसी से छिपा नहीं है... ऐसे में सहयोगी को और मजबूत बनाना बीजेपी का पहला लक्ष्य होना चाहिए...
ये बात तो भविष्य की हुई लेकिन वर्तमान हकीकत की बात करें तो बीजेपी के हाथों से एक-एक कर राज्यों की सत्ता छिनती जा रही है.. और सरकार बनाना बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर बन चुका है... याद कीजिए 2014 का वो दौर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार सत्ता में आए और उससे पहले भारतीय जनता पार्टी सिर्फ 7 राज्यों में सत्ता संभाल रही थी... लेकिन मार्च 2018 आते-आते बीजेपी ने तेज़ी से राज्यों में कदम बढ़ाए और 21 राज्यों में सरकार बना ली... लेकिन बीजेपी के विजय रथ पर 2018 से ब्रेक लगनी शुरु हो गई... बीजेपी को उन राज्यों में शिकस्त का सामना करना पड़ा जो उसका गढ़ था जहां वो अजेय समझी जाती थी... साल 2019 में महाराष्ट्र के नाटकीय सियासी घटनाक्रम में नतीजे बीजेपी के पक्ष में नहीं रहा... यही हाल झारखंड में रहा बीजेपी के हाथ से सत्ता फिसल गई... बहरहाल मोदी सरकार को संभलने की ज़रूरत है... साल 2018 विधानसभा चुनावों में एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को शिकस्त मिली... और दिल्ली विधानसभा 2020 का चुनावी परिणाम भी खतरे की घंटी है,,,
लेकिन ऐसे कारणों पर गौर करना बेहद ज़रूरी है कि क्या वजह है कि जिस पार्टी की केंद्र में बहुमत की सरकार है वो विधानसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पा रही है... क्या दूसरी पार्टियों की तैयारियां बीजेपी से ज्यादा अच्छी होती हैं या फिर केंद्र सरकार के लिए जा रहे ताबड़तोड़ बड़े फैसले ही उसके गले की फांस बन रहे हैं... सरकार की नीयत और नीति स्पष्ट है लेकिन विपक्षी पार्टियों की नीति और नीयत स्पष्ट नहीं रही... यहां तक कि महाराष्ट्र में बीजेपी के पुराने साथियों में से एक रहे शिवसेना की सियासी नीयत भी उनकी नीतियों पर भारी पड़ती दिखी...
दिल्ली चुनाव के बाद कांग्रेस के पास क्या ?
दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी का जादू अगर फीका रहा तो कांग्रेस की हालत तो वैसी ही रही कि तुम क्या लेकर आए थे क्या लेकर जाओगे... मतलब उनकी इतनी बुरी हालत का ज़िम्मेदारी आखिर कौन है... कमज़ोर नेतृत्व या फिर धरातल पर कार्यकर्ताओं और नेताओं का सक्रिय ना रहना... इसके अलावा पार्टी के भीतर होने वाली आपसी फूट भी कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी को वेंटिलेटर पर ले आई है... ज़िम्मेदार सब हैं लेकिन कांग्रेस में ज़िम्मेदारी ले तो कौन ले... इस बार दिल्ली की सड़कों पर निकलने के बाद पता चला कि मोदी सरकार से सब खुश तो हैं लेकिन सिर्फ खुश होना ही काफी नहीं रहा बल्कि खुशी तो बिजली, पानी और शिक्षा में छिपी है... यानि राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय हावी रहे स्थानी मुद्दे... बीजेपी ने कोशिश तो की मुद्दों राष्ट्रीय हों लेकिन दिल्ली की जनता ने केजरीवाल सरकार को एक और मौका देने का मन बना लिया था... और जो संशय की स्थिति में रहे उनका वोट गया बीजेपी को... लेकिन कांग्रेस को लेकर किसी भी वोटर के मन में कोई संशय नहीं रहा... यानि वोट नहीं दिया गया...   
आंकड़ों की मानें तो साल 2014 में जब बीजेपी सत्तासीन हुई तो उसी के साथ राज्यों में प्रदर्शन बेहद शानदार रहा... हमारे प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और अमित शाह के कुशल नेतृत्व ने लोगों का दिल जीत लिया... उसके बाद बीजेपी ने हर उस मुद्दे पर काम करना शुरु किया जो उनके मेनिफेस्टो में था... विपक्षी की चिंता किए बगैर... लेकिन विपक्ष तो नाराज़ ही रहा... संसद के भीतर भले ही सरकार के कुछ फैसलों को विपक्ष का साथ मिलता रहा लेकिन सड़क पर विपक्षी दलों का गुस्सा तो देखते ही बनता था... इस गुस्से का फायदा भी क्षेत्रीय पार्टियों को खूब मिला लेकिन कांग्रेस इसका फायदा ज्यादा नहीं उठा सकी... कांग्रेस के पास अब भी वक्त है खुद की बुनियाद को याद करके पार्टी को मजबूत करने का... तो बीजेपी के पास भी वक्त है अपनी गलतियों से सीखने का... क्योंकि दुनियाभर में नाम कमाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही देश की उन सियासी पार्टियों से पार पाने की है जो राजनीति को एक बिजनेस मानते हैं...