सोमवार, नवंबर 29, 2010

Reality shows ki reality

रियलिटी शोज् की रियलिटी

इन दिनों इडियट बॉक्स अब इडियट नहीं रह गया है बल्कि अपनी बेहूदा तस्वीरों और टीआरपी के नाम पर अश्लीलता परोसकर दर्शकों को लगातार इडियट बना रहा है... हालांकि जब इस इडियट बॉक्स का अविष्कार हुआ था उस वक्त किसी ने भी नहीं सोचा था कि ये कैसे लोगों की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाएगा... और लोग चाहकर भी इसके प्रभाव से अपने को दूर नहीं कर सकेंगे... हालांकि भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में दूरदर्शन पर जब धार्मिक सीरियल्स की शुरुआत हुई तो जनता को लगा कि जैसे भगवान खुद धरती पर उतर आए हैं और लोग रामायण को देखते वक्त हाथ जोड़कर पूरा सीरियल एक सांस में देख जाते थे... इसके बाद भी काफी समय तक धार्मिक सीरियल्स ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा लेकिन अब समय आ चुका था पारिवारिक धारावाहिकों का... आपको हम लोग और नुक्कड़ जैसे धारावाहिकों की याद तो होगा ही... कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि 'हमलोग’ जैसा शो टीवी के परदे पर न कभी हुआ, न कभी आगे होगा... उस जैसा कुछ नहीं हो सकता... उस समय दूरदर्शन का एक ही उद्देश्य था लोगों को शिक्षित करना और उन्हे पारिवारिक संस्कार और संस्कृति की सीख देना... समय बदला, सोच बदली और धारावाहिकों को देखने वालों का दिमाग बदला... आज के लोग पहले से ज्यादा खुले विचारों के हैं और खुलेपन में भरोसा रखते हैं चाहे वो रिश्तों का खुलापन हो या फिर व्यवहार का... लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि लोगों को अश्लीललता से प्रेम हो गया है... दरअसल आज के समय में धारावाहिक बनाने वाले लोगों का ईमान और धर्म सिर्फ एक ही है और वो है पैसा... पहले टीआरपी की बात नहीं थी लेकिन अब इंडस्ट्री में पे पुशस आ गए हैं और उनका मकसद सिर्फ पैसे कमाना है... समय थोडा़ और बदला अब धीरे-धीरे पारिवारिक सीरियल्स से अगल हटकर रियलिटी शोज् जगह बनाने लगे हैं... इस शो के साथ जितना विवाद जुड़ता जाता है उतनी ही शोज् की टीआरपी बढ़ती जा रही है... हाल ही में राखी सावंत के रियलिटी शो ने तो एक परेशान इंसान की जान ही ले ली... राखी सावंत वही शख्स हैं जिन्हे मीका मामले में खुद इंसाफ नहीं मिल सका वही आजकल दूसरों को इंसाफ देने की कोशिश कर रही हैं... ऐसा ही दूसरा रियलिटी शो है बिग बॉस जिसमें रहने वाले लोग किसी ना किसी समय विवादों से जुड़े रहे हैं... अब तो पामेला एंडरसन जैसी सेलीब्रेटी भी इस शो का हिस्सा बनते जा रहे हैं... कुछ ऐसी ही कहानी बिंदास पर आने वाले शो इमोशनल अत्याचार की है जिसमें कोई भी लड़का या लड़की अपने प्रेमी या फिर प्रेमिका का रियलिटी टेस्ट करवा सकता है और देख सकता है कि वो उनके पीछे क्या गुल खिलाता है... अब लोगों की निज़ी ज़िंदगी से हमारा क्या लेना-देना लेकिन सीरियल्स बनाने वाले ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि टीआरपी के लिए वो सबकुछ करना पड़ेगा जो ज़रूरी है... अब सवाल ये उठता है कि भारत के उन नेताओं को क्या हो गया है जो देश की संस्कृति को बचाने के लिए जान की बाजी लगा देने की बात करते हैं लेकिन बढ़ती अश्लीलता के खिलाफ कुछ भी करने को तैयार नहीं हैं... अब ऐसे में कोई क्या करे, अपने बच्चों को टीवी देखने से रोके या फिर खुद ही ऐसे शोज बनाने वालों के खिलाफ सड़कों पर उतर आये... ये देखना काफी दिलचस्प होगा कि इडियट बॉक्स कब तक लोगों को इडियट बनाता है...?

अभितोष सिंह

सोमवार, अक्टूबर 18, 2010

रामलीला में कलाकारों की दबंगई


अजमेर में रामलीला के दौरान रावण का किरदार निभा रहा कलाकार शराब के नशे में इतना टल्ली था कि राम के तीरों का जवाब जेने से पहले ही वो गिर पड़ा और रामायण का एक दबंग पात्र हंसी का पात्र बनकर रह गया... इतना ही नहीं उस किरदार ने खुद को बेकसूर बताया और कहा कि उसके चेहरे से क्या लगता है कि उसने पी रखी है... लेकिन शायद उसे याद नहीं रहा कि गिरने के बाद वो खुद के पैरों पर नहीं जा सका था बल्कि उसे कई सहारों की ज़रूरत पड़ी थी... उसने धार्मिकता के परिपूर्ण रामलीला का महज हंसी की लीला बनाकर अपना पल्ला झाड़ लिया... दूसरा एक ऐसा ही मामला सामने आया यूपी के आगरा का जहां के रावण ने तो एक कदम आगे निकलकर मरने से ही इंकार कर दिया... उनका कहना था कि उनके हिस्से में संवाद कम आये और डांट ज्यादा थी इसलिए उन्होने ऐसा किया... उन्हे आयोजकों ने लाख समझाया लेकिन वो जनाब कहां मानने वाले थे उन्होने तो जैसे ठान रखा था कि बस रामलीला की लीलाओं को उल्टा कर उसे किसी और की लीला में पिरो देंगे और दुनिया को बता देंगे कि रामलीला करवाना कोई खेल नहीं... इधर कुछ ऐसी ही रीत है कौशांबी की जहां कुप्पीयों से राम और राम की सेना युद्ध लड़ती है... इसमें में खून-खराबा तक हो जाता है... खैर ये तो बात हुई देश के कुछ हिस्सों में हुई रामलीलाओं की जहां पर रावण का किरदार राम के किरदार पर भारी पड़ा और हनुमान जी तो मानो कहीं दिखाई ही नहीं पड़ी... लेकिन रामलीला का आयोजकों को समझना चाहिए की रामलीला महज् कोई खेल नहीं है बल्कि पूरी दुनिया को इनके ज़रिए ये बताने की कोशिश की जाती है कि आखिर इस धार्मिक युद्ध में किस तरह से धर्म अधर्म पर भारी पड़ा था और पाप को पुण्य ने हराया था... इन लीलाओं में महज् राम के चमत्कारों को ही नहीं दिखाया जाता है बल्कि ये दिखाया है कि विनाशकाले विपरीत बुद्दि... अच्छे से अच्छे जानकार की अगर मति मारी जाए और वो दिग्भ्रमित हो जाए तो उसका विनाश होने से कोई नहीं रोक सकता... खासतौर से बच्चों को यही शिक्षा दी जाती है कि सफलता की राह भले ही अच्छाई के लिए थोड़ी कठिन हो लेकिन अंत में जीत उसी की होती है जो सच्चा हो... तो भईये अगले रामलीला में कम से कम ऐसा ना करें कि रामलीला में इस तरह की कोई घटना घटे जो हमें शर्मिंदा करे...

शनिवार, अक्टूबर 16, 2010

दशहरे के दिन


दशहरा को मनाया जाता है अच्छाई की बुराई पर जीत के रुप में... ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने रावण को मारकर धर्म की जीत सुनिश्चित की थी... आज के दौर में इस त्योहार के मायने काफी हद तक बदल गए हैं... आधुनिकता का दम भरने वाले लोग रावण के पुतले को बेदम होता देखना तो चाहते हैं लेकिन बिल्कुल अलग अंदाज में... अब रावण के पुतले पहले से ज्यादा रंग-बिरंगे होते जा रहे हैं उनपर भी इक्कसवीं सदी की टेक्नोलॉजी का भरपूर प्रयोग होता दिख रहा है... आपको याद होगा कि दशहरे के दिन लगने वाले मेले को लेकर लोगों में खासा उत्साह रहा करता था... खासकर घर के बच्चों को इस दिन पिताजी की ओर से कुछ पैसे दिए जाते थे ताकि वो मेले में जाएं और अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीद सकें... लेकिन मॉल कल्चर ने लोगों से मेले का उत्साह छीन लिया है... क्योंकि अब लोगों को खुशी मिलती है बाज़ारवाद का हिस्सा बनने में... लोगों को संतुष्टि मिलती है असंतुष्टि में क्योंकि आज का बाज़ारवाद यही कहता है कि आखिर क्यों संतुष्ट हैं आप... हर बार की तरह इस बार भी दशहरे के दिन रावण को जला दिया जाएगा... लेकिन धीरे-धीरे वो पुराना उत्साह कहीं गुम होता नज़र आ रहा है...मुझे याद है कि आज भी संगम नगरी इलाहाबाद की गलियों में ऐसी-ऐसी झांकियां निकाली जाती हैं जिनको देखकर आपको कलाकारों की मेहनत और उनके विजन का पता चल जाएगा... लेकिन मैट्रो शहरों के संदर्भ में ये बातें बेमानी सी मालूम होती हैं... इस बार भी दशहरे की छुट्टियों में लोग मेले में कम और मॉल्स में ज्यादा नज़र आ रहे हैं... इस पूरे हफ्ते जगह-जगह भले ही रामलीला के कलाकारों का आवाज खूब गूंजती रही लेकिन स्टेज से उतरने के बाद यही कलाकार अपनी एक अदद पहचान के लिए आज भी जूझ रहे हैं... क्योंकि धीरे-धीरे ही सही लोग कहीं ना कहीं उस मानसिकता के गुलाम होते जा रहे हैं... जो उन्हे अपनी पुरानी संस्कृति से दूर और खोखली पश्चिमी सभ्यता के करीब लाती जा रहे है...

शुक्रवार, सितंबर 17, 2010

स्वामी विवेकानंद


जब आप सफलता की ओर जा रहे हों तो पीछे मुड़कर न देखें , लेकिन सफल होने के बाद पीछे मुड़कर देखना न भूलें...
स्वामी विवेकानंद

मंगलवार, अगस्त 31, 2010

रुक जाना नहीं तुम....


जब तक है सांस
चलेगा आदमी
रुकेगा नहीं।

सुबह से शाम
शाम से रात
और फिर रात से सुबह तक
बढ़ेगा आदमी
बँधेगा नहीं।

एक धड़कन लिये
सांस को साथी बनाये
ऊँचाइयों की मेहराबों पर
चढेगा आदमी
थमेगा नहीं।

उसके लिये कहीं
न कोई अति है
न कोई समझौता
न तो सहमति है
वह तो जीता है -
एक-एक पल में
उसके लिये तो
सांस ही गति है।

{कृष्ण बिहारी}

वर्तमान परिप्रेक्ष्य के लिए ये कविता बिल्कुल सटीक बैठती है...

रविवार, अगस्त 15, 2010

आज़ादी के मायने



पल-पल बदलते रिश्ते, और रिश्तों की भीड़ में पल-पल बदलते इंसान,
क्या ये है आज़ादी की तस्वीर...
या फिर पल-पल बदलती तस्वीर, और बदलते उनके रंग
क्या ये हैं आज़ादी के रंग
गरीबी हटाने के लिए हटा दिए गए गरीब, या फिर उजाड़ दिए उनके घर...
अगर इन्होने मांगा हक, तो इन्होने नेताओं की आज़ादी के रंग में डाल दिया भंग...
ये है कौन सा ढंग
क्या ये है आज़ादी की सच्चाई
बढ़ती महंगाई, बढ़ते खर्चे, बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता सरदर्द और बढ़ता जीवन का दर्द
इन्हे कम करने के लिए कभी लेते हैं उधार तो कभी लेते हैं कर्ज... इसी, कर्ज के बोझ तले कभी तेज़ तो कभी धीरे, खिंचती जा रही है जिंदगी की रेल
क्या इस आज़ादी से हमारा है कोई मेल
एक दिन सुनते हैं आज़ादी के गीत, और खुश हो जाते हैं कि हम हैं आज़ाद लेकिन अगले ही दिन फिर निकल पड़ते हैं दुनिया को बेवकूफ बनाने और आज़ादी के नाम पर लूट मचाने
क्य़ा ये है आज़ादी या फिर उससे जुड़े असल मायने

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

मेरे अपने ...


अभी हाल ही में मैने फिल्म मेरे अपने देखी... इस फिल्म को 1971 में बनाया गया था जबकि फिल्म के निर्माता थे रामू, राज और एन सी सिप्पी... ये तो बात हुई निर्माताओं की लेकिन फिल्म के सबसे खास पहलू के साथ जुड़ा है एक ऐसा नाम जिसने हिंदी सिनेमा में एक लंबा वक्त गुज़ारा है... यहां बात हो रही है फिल्म के लेखक और निर्देशक गुलज़ार का..गुलज़ार ने एक साधारण सी कहानी को अपने निर्देशन में कुछ यूं पिरोया कि हर किरदार जीवंत हो उठा और छैनू का रोल भी फिल्म और समाज के लिए अहम लगने लगा... हालांकि श्याम की किरदार निभा रहे कलाकार विनोद खन्ना काफी नये थे लेकिन उनका साइकिल पर चश्मा लगाकर चलना उस वक्त के युवाओं के लिए निश्चित तौर पर रोल मॉडल जैसा रहा होगा... लेकिन फिल्म का सबसे कसा हुआ पहलू था मीना कुमारी का बुढ़ापा जिसनें फिल्म में जान फूंक दी... मीना कुमारी भले ही फिल्म में एक कमज़ोर नानी का रोल निभा रही थीं जिनके साथ उन्ही के रिश्तेदारों ने दगा किया लेकिन उनका किरदार और अभिनय उतना ही ताकतवर था...फिल्म में ऐसे भी बहुत से किरदार थे जिन्होने फिल्म को आम से खास बना दिया और फिल्म से जुड़े इतिहास को खासमखास... फिल्म का सुखद पहलू रहा अंतर्द्वंद से जूझते कुछ युवा जो कम से कम एक बूढ़िया की इज्जत करना जानते थे... मीना कुमारी के किरदार ने हर किसी को अपना बना लिया सिवाय अपने ही रिश्तेदारों के... उनकी सीख आज के समय में भी बिल्कुल सही बैठती है क्योंकि आज के दौर में रिश्तेदार होना अपनेपन की निशानी नहीं है... हालांकि फिल्म के अंत में मीना कुमारी को गोली लग जाती है और वो स्वर्ग की यात्रा पर निकल जाती हैं लेकिन जाते-जाते वो सीख दे जाती हैं कि प्यार निभाने के लिए दिल में प्यार के साथ-साथ सच्चाई को होना भी ज़रूरी है... फिल्म भले ही चालीस साल पुरानी हो चुकी है लेकिन उसकी सीख कभी पुरानी नहीं पड़ेगी...

रविवार, जुलाई 18, 2010

एक शाम वीकेंड के नाम


वीकेंड के दिन अक्सर शॉपिंग मॉल्स रोज के मुकाबले भरे रहते हैं, फिल्मों के टिकट ज्यादा बिकते हैं, थियेटर में नाटक देखने वालों की अच्छी-खासी तादाद होती है लेकिन कुछ ऐसे भाग्यशाली लोग भी होते हैं जिन्हे विकेंड पर काम करने के अवसर मिलते हैं और उनमें से एक मैं भी हूं... हालांकि मेरे जैसे भाग्यशाली और भी लोग हैं जो मेरी ही तरह अपने वीकेंड को संभावना रहित दिन बनाते हैं... संभावनारहित इसलिए क्योंकि आज के दिन ऐसी संभावना बहुत ही कम होती है कि कोई बड़ी वारदात हो, किसी बड़े भवन का उद्घाटन हो या फिर किसी बड़े नेता के यहां कोई बड़ा पॉलीटिकल डेवलेपमेंट हो... हालांकि मैं अपने विषय से थोड़ा भटक गया हूं लेकिन अपने विषय से जोड़ने के लिए ये बताना बहुत ज़रूरी था... दरअसल इस पूरे लेख को लिखने के पीछ बड़ी वजह है जगजीत सिंह की वो गजल जिनके शब्द हैं अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं... रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं... आज की भागती-दौड़ती जिंदकी का हिस्सा ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने सफर में अपनी मर्जी से नहीं चलते बल्कि उनपर मर्जी चलती है उनके सीनियर्स की, उनके ऑफिसर्स की, उनके ऑफिस प्रबंधन की और उनके कुलीग की... ये इसलिए क्योंकि पैसा कमाने की जुगत ने कब अपने ही ऊपर से अपना ही नियंत्रण खो दिया ये पता ही नहीं चला... ये बातें हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी की असलियत हमारे सामने लाती हैं...ये बातें हमारे उस एहसास को खत्म करती जा रही हैं जिनके सहारे हम अपनी जिंदगी को जीते हैं... ये उस जिंदगी का खोखलापन है जिसे हम जी रहे हैं... हालांकि वीकेंड पर काम और जिंदगी के इस फलसफे का आपस में कुछ लेना देना नहीं है क्योंकि खोखली जिंदगी तो उनकी भी हैं जो वीकेंड पर छुट्टियां मनाते हैं, और ऐश करने के बहाने अपनी दोहरी जिंदगी को और मजबूत बनाते हैं...

सोमवार, जुलाई 12, 2010

रंग बदलती दुनिया


संदिग्ध होता मौसम

जानलेवा होतीं सब्जियां

ज़हरीला होता पानी

संगीन होते हालात

बढ़ती महंगाई की मार

ये ना तो किसी फिल्म की कहानी है, ना ही किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा

ये महज शब्दों का बुना हुआ जाल नहीं है ना ही किसी कवि की कोरी कल्पना... ये सच है उस समाज का, जिसका हिस्सा हम हैं, आप हैं... बाहर से भले ही ये दुनिया रंग-बिरंगी दिखे लेकिन इसका खोखलापन बहुत ही कम लोगों को दिखता है... दुनिया के कैनवस पर भले ही ऊपर वाले ने कितने ही रंग भरे हों लेकिन इस रंग बदलती दुनिया में ना कुछ तेरा है ना मेरा है... वाकई इस वक्त तो यही याद आता है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो... मेरे दिमाग में ये ख्याल इस पेंटिंग को देखकर आया जिसमें रंग तो बहुत भरे हैं लेकिन रंगों के बीच छिपी है कलाकार की वो कल्पना जिसमें दिखाई तो सभी दे रहे हैं लेकिन अगल-अलग... ये पेंटिंग मुझे गुगल पर सर्च करते हुए मिली कलाकार का नाम नहीं पता है लेकिन अगर किसी को पता चले तो ज़रूर बताए...

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

बेमिसाल गुरु


गुरुदत्त अगर आज ज़िंदा होते तो अपनी फिल्मों की ताऱीफ में कसीदे गढ़े जाने से खासे खुश होते... अपनी एक-एक फिल्म में उन्होने एक निर्देशन क्षमता की पराकाष्ठा से दुनिया को परिचित कराया... एक साधारण सी कहानी को असाधारण निर्देशन का साथ मिल जाए तो फिल्म खास हो जाती है... गुरुदत्त साहब की फिल्में खास से भी परे थीं क्योंकि उनकी फिल्मों में कलाकारी की अतिशयोक्ति नहीं होती थी, वो किसी बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट की मोहताज नहीं होती थीं, उन्हे तो बस दर्शकों का प्यार पाना होता था और लोगों को ज़िंदगी में एक जगह पाना था... फिल्म प्यासा जिसका निर्देशन भी गुरुदत्त साहब ने किया था और एक्टिंग भी की थी... कहा जाता है कि ये फिल्म उनके दिल के काफी करीब थी... प्यासा फिल्म से उनका काफी लगाव था और फिल्म की कुछ घटनाएं उनके जीवन, उनके दिल के काफी करीब थीं... इस फिल्म के माध्यम से गुरु साहब ने समाज की उस सच्चाई को उजागर करने की कोशिश की जिसके बारे में जानते तो सभी हैं लेकिन अनजान बने रहते हैं... आप लोग शायद मेरा इशारा समझ ही गए होंगे... प्यासा फिल्म में इस बात की झलक देखने को मिलती है कि कैसे किसी का काम उसका भगवान होता है इसमें ना पैसे रुपए की चाहत होती है ना शोहरत की... लेकिन समाज का स्वार्थ कैसे किसी को आगे नहीं बढ़ने देता है, कोई कैसे इस डर में जीता है कि कहीं किसी की लोकप्रियता उसकी कमाई का ज़रिया हा ना बंद कर दे... ये फिल्म कहानी है उस इंसान की जो अपने ही अंतर्द्वंद से लड़ता है और अंत में वो मुकाम हासिल करता है जिसका वो असल हकदार होता है... लेकिन फिल्म अभी बाकी है... दरअसल पूरी फिल्म में गुरुदत्त साहब का किरदार यानि विजय अपनों की चाहतों से जूझता रहा और अंत में अपने लिए इस दुनिया को नाकाफी बताता है... फिल्म का सार कुछ इस तरह है कि अगर यही दुनिया है और अगर ये मिल भी जाए तो क्य़ा हो... कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि गुरुदत्त साहब जैसा शोमैन बॉलीवुड के फिल्म इतिहास में आज तक नहीं आया... लेकिन इस शोमैन की आकस्मिक मौत ने पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज को हिला दिया लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ज़िंदगी में सबकुछ पा लेने के बाद भी किसी ना किसी तरह की रिक्तता शेष रह जाती है.,., गुरुदत्त साहब के बारे में लिखने के लिए कभी वक्त की कमी हो जाती है तो कभी शब्दों की लेकिन आज मैं इस लिजेंड को सैल्यूट कर रहा हूं और एक श्रद्दांजली दे रहा हूं अपने शब्दों के माध्यम से... क्योंकि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का शब्दों से ज्यादा अचूक माध्यम कुछ नहीं होता... हमारे समय के लिए गुरुदत्त साहब भले ही बीते ज़माने की बात हो चुके हैं लेकिन वो आज भी हमारे बीच ज़िंदा हैं अपनी फिल्मों के ज़रिए अपनी एक्टिंग के ज़रिए और अपनी उस मुस्कुराहट के लिए जिसने कभी लाखों दिलों पर राज किया...