मंगलवार, अप्रैल 17, 2018

बेटियां, बंदिशें और बेड़ियां..





बेटियां, बेड़ियां और बंदिशें...
अब आप सोच रहे होंगे कि बंदिशें और बेड़ियों के साथ सिर्फ बेटियों का ज़िक्र क्यों किया... दरअसल बेटों के लिए तो ना तो बंदिशें हैं और ना हीं उनके लिए कोई बेड़ियां मायने रखती हैं... ये हमारे समाज की असल मानसिकता है... दावे लाख किए जाएं कि अब सारे शब्दों का इस्तेमाल आप बेटों के साथ भी कर सकते हैं और बेटियों के साथ भी... लेकिन क्या वाकई ये संभव हो पाया है... क्या वाकई हम बेटियों को समाज में वो सुरक्षित माहौल दे पाएं हैं जिसकी वो हकदार हैं... दुष्कर्म की हर घटना के बाद हमारी रूह कांप उठती है... रेप की हर वारदात को सुनने के बाद हमारे गुस्से का उफान कभी टीवी चैनल्स पर दिखता तो कभी सड़कों पर नारेबाज़ी और प्रदर्शन के रुप में... लेकिन क्या माहौल बदलने लगा है... क्या वाकई ऐसी वारदातों का कभी अंत हो सकेगा... क्या कभी ऐसा मुक्कमल वक्त आ सकेगा और हम कह सकेंगे कि मुश्किलें कम हुईं हैं और माहौल पूरी तरह से सुरक्षित हो गया है...

बिंदास, बेबाक और बेखौफ बेटियां...
खैर बेटियों को लेकर एक निराशाजनक शब्दों के साथ तो मैने शुरुआत कर दी लेकिन इसी समाज की तमाम बेटियां आज सशक्त हैं... वो बिंदास हैं, बेबाक हैं और बेखौफ भी... ये ना तो समाज की बंदिशों को मानती हैं और ना ही किसी तरह की समाजिक वर्जनाओं को जो इन्हे हाशिए पर लाती हैं... आज अत्याचार के खिलाफ ये महिलाएं सड़क पर उतरकर महिलाओं के साथ-साथ उन उन पुरुषों को भी जागरुक करने की मुहिम में जुटी हैं जो महिला सशक्तिकरण पर होने वाली बहस का हिस्सा तो होते हैं लेकिन जब कुछ करने का वक्त आता है तो अपने पैर पीछे खींच लेते हैं... देश के मौजूदा हालातों का ज़िक्र करें तो बच्चियों के खिलाफ हुईं कई क्रूर हिंसाओं ने उन बहानों को पीछे धकेल दिया है जिनके नाम पर अपराधियों की मानसिक स्थिति का विश्लेषण किया जाता रहा है... बच्चियों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा में किसी भी तरह की माफी की संभावना ही नहीं बनती... अपराधियों की पहचान होते ही उन्हे ऐसी सजा दी जाए जो ऐसे मामलों में अपराधियों के लिए सबक बने और समाज के लिए नज़ीर...


बुधवार, अप्रैल 11, 2018

कॉमेडी में रंक विवादों में राजा ?


ये कपिल शर्मा कौन है ?

ना अच्छे कलाकार बन पाए ना अच्छे इंसान...

अपने शो में महिलाओं को तिरस्कृत कर देना... उनके शरीर का मज़ाक बना देना... चेहरे, होंठ को लेकर कोई भी भद्दी टिप्पणी कर देना... और महिलाओं के भेष में पुरुषों को उतारकर फिर से महिलाओं का मज़ाक उड़ाना... ये सबकुछ कपिल के लिए मामूली सी बातें रहीं हैं... महज़ दस सालों के भीतर कपिल उस मुकाम तक पहुंच गए जिसपर पहुंचने की कोशिश तमाम कॉमेडियन सालों-साल करते रहे... कपिल ऊंचाई पर पहुंचते चले गए और उनकी भाषा का स्तर गिरता गया... कपिल का कद बढ़ा, लोकप्रियता बढ़ी, भाव बढ़े लेकिन कपिल की सोच छोटी होती गई... कपिल की सोच का स्तर इतना गिर गया कि वो एक पत्रकार को फोन पर धमकी देते-देते उसकी मां और बेटी के लिए यौन हिंसा की बातें कहने लगे... महिलाओं के लिए किसी भी तरह की भद्दी टिप्पणी भी यौन हिंसा मानी जाती है... ऐसे में कपिल को किसने हक दिया कि वो अपने स्टारडम और शराब के नशे में धुत्त होकर किसी को भी कुछ भी कह दे... किसी के लिए कोई भी टिप्पणी कर दे... खुद को खुदा से भी ऊपर मान लेना ही सबसे बड़ी इंसानी गलतफहमी है... और कपिल भी इसी बीमारी का शिकार हो गए जिसका कोई ईलाज नहीं... भैय्या कपिल अगर इतना परेशान हो तो दूसरों को क्यों परेशान कर रहे हो... भाई एक्टिंग नहीं आती तो सीखो, दूसरों को नसीहतें देने से कुछ नहीं होगा... एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा है तो आलोचना के लिए तैयार रहो... आलोचना और शिकायत में फर्क करना सीखो... कपिल शर्मा इस देश में आज भी कानून का राज है... आज भी न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बना हुआ है... किसी महिला के लिए अपशब्द बोलना और यौन हिंसा की धमकी देना भी अपराध की श्रेणी में आता है... कपिल कॉमेडी के राजा से तुम कब विवादों के रंक बन गए तुम्हे पता ही नहीं चला... हकीकत है कि शोहरत जब किसी के सिर चढ़ जाती है तो उसे वो बर्बाद करके छोड़ती है...

सोमवार, अप्रैल 09, 2018

सियासत गर्मा नहीं रही है बल्कि उबल रही है...


राजनीति के तेल में कभी पकौड़े तले जा रहे हैं कभी छोले-भटूरे... पकौड़े तलना रोज़गार का ही स्वरूप बताया गया है, तो छोले-भटूरे खाकर सांकेतिक तौर पर उपवास रखा गया... इन दोनों ही मामलों पर सियासत खूब गरमाई... गर्मा गर्म पकौड़ों की तरह... कभी विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा तो सरकार ने विपक्षी पार्टियों को तीखे आरोपों के तीर से छलनी करने की कोशिश हुई... विपक्ष छलनी हुआ या नहीं लेकिन ये तो तय है कि इन सब आरोप-प्रत्यारोप की बौछार के बीच जनता ज़रूर छली गई... जिस देश में लोकतंत्र की दुहाई देते-देते जनता से वोटों का जुगाड़ कर लिया जाता है उसी देश में लोकतंत्र के नाम जनता की ज़रूरतों की अनदेखी भी की जाती है... ये हकीकत है कि मौजूदा हालात में राजनीति उस दिशा की ओर चल पड़ी है... जहां पर शब्दों की मर्यादा इतनी गिरा दी जाती है कि दूसरी पार्टियां इन्ही शब्दों को पिरोकर घातक सियासी हथियार तैयार कर लेते हैं... और समय-समय पर ब्रह्मास्त्र की तरह इसका दूसरी पार्टियों पर इस्तेमाल भी कर लेते हैं... आज की राजनीति में शब्दों की मर्यादा और गरिमा ऐसे स्तर पहुंच चुकी है कि तमाम पार्टियों की तुलना जानवरों से कर दी जाती है... स्तर इतना नीचे गिरेगा इसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा... खासकर उस जनता ने जो ये मानकर चलती है कि किसी को जानवर कहना गाली देने जैसा है... खैर जनता जनार्दन की अदालत में सभी को आना है और फैसला जनता को करना है...