
वीकेंड के दिन अक्सर शॉपिंग मॉल्स रोज के मुकाबले भरे रहते हैं, फिल्मों के टिकट ज्यादा बिकते हैं, थियेटर में नाटक देखने वालों की अच्छी-खासी तादाद होती है लेकिन कुछ ऐसे भाग्यशाली लोग भी होते हैं जिन्हे विकेंड पर काम करने के अवसर मिलते हैं और उनमें से एक मैं भी हूं... हालांकि मेरे जैसे भाग्यशाली और भी लोग हैं जो मेरी ही तरह अपने वीकेंड को संभावना रहित दिन बनाते हैं... संभावनारहित इसलिए क्योंकि आज के दिन ऐसी संभावना बहुत ही कम होती है कि कोई बड़ी वारदात हो, किसी बड़े भवन का उद्घाटन हो या फिर किसी बड़े नेता के यहां कोई बड़ा पॉलीटिकल डेवलेपमेंट हो... हालांकि मैं अपने विषय से थोड़ा भटक गया हूं लेकिन अपने विषय से जोड़ने के लिए ये बताना बहुत ज़रूरी था... दरअसल इस पूरे लेख को लिखने के पीछ बड़ी वजह है जगजीत सिंह की वो गजल जिनके शब्द हैं अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं... रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं... आज की भागती-दौड़ती जिंदकी का हिस्सा ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने सफर में अपनी मर्जी से नहीं चलते बल्कि उनपर मर्जी चलती है उनके सीनियर्स की, उनके ऑफिसर्स की, उनके ऑफिस प्रबंधन की और उनके कुलीग की... ये इसलिए क्योंकि पैसा कमाने की जुगत ने कब अपने ही ऊपर से अपना ही नियंत्रण खो दिया ये पता ही नहीं चला... ये बातें हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी की असलियत हमारे सामने लाती हैं...ये बातें हमारे उस एहसास को खत्म करती जा रही हैं जिनके सहारे हम अपनी जिंदगी को जीते हैं... ये उस जिंदगी का खोखलापन है जिसे हम जी रहे हैं... हालांकि वीकेंड पर काम और जिंदगी के इस फलसफे का आपस में कुछ लेना देना नहीं है क्योंकि खोखली जिंदगी तो उनकी भी हैं जो वीकेंड पर छुट्टियां मनाते हैं, और ऐश करने के बहाने अपनी दोहरी जिंदगी को और मजबूत बनाते हैं...

