रविवार, जुलाई 18, 2010

एक शाम वीकेंड के नाम


वीकेंड के दिन अक्सर शॉपिंग मॉल्स रोज के मुकाबले भरे रहते हैं, फिल्मों के टिकट ज्यादा बिकते हैं, थियेटर में नाटक देखने वालों की अच्छी-खासी तादाद होती है लेकिन कुछ ऐसे भाग्यशाली लोग भी होते हैं जिन्हे विकेंड पर काम करने के अवसर मिलते हैं और उनमें से एक मैं भी हूं... हालांकि मेरे जैसे भाग्यशाली और भी लोग हैं जो मेरी ही तरह अपने वीकेंड को संभावना रहित दिन बनाते हैं... संभावनारहित इसलिए क्योंकि आज के दिन ऐसी संभावना बहुत ही कम होती है कि कोई बड़ी वारदात हो, किसी बड़े भवन का उद्घाटन हो या फिर किसी बड़े नेता के यहां कोई बड़ा पॉलीटिकल डेवलेपमेंट हो... हालांकि मैं अपने विषय से थोड़ा भटक गया हूं लेकिन अपने विषय से जोड़ने के लिए ये बताना बहुत ज़रूरी था... दरअसल इस पूरे लेख को लिखने के पीछ बड़ी वजह है जगजीत सिंह की वो गजल जिनके शब्द हैं अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं... रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं... आज की भागती-दौड़ती जिंदकी का हिस्सा ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने सफर में अपनी मर्जी से नहीं चलते बल्कि उनपर मर्जी चलती है उनके सीनियर्स की, उनके ऑफिसर्स की, उनके ऑफिस प्रबंधन की और उनके कुलीग की... ये इसलिए क्योंकि पैसा कमाने की जुगत ने कब अपने ही ऊपर से अपना ही नियंत्रण खो दिया ये पता ही नहीं चला... ये बातें हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी की असलियत हमारे सामने लाती हैं...ये बातें हमारे उस एहसास को खत्म करती जा रही हैं जिनके सहारे हम अपनी जिंदगी को जीते हैं... ये उस जिंदगी का खोखलापन है जिसे हम जी रहे हैं... हालांकि वीकेंड पर काम और जिंदगी के इस फलसफे का आपस में कुछ लेना देना नहीं है क्योंकि खोखली जिंदगी तो उनकी भी हैं जो वीकेंड पर छुट्टियां मनाते हैं, और ऐश करने के बहाने अपनी दोहरी जिंदगी को और मजबूत बनाते हैं...

सोमवार, जुलाई 12, 2010

रंग बदलती दुनिया


संदिग्ध होता मौसम

जानलेवा होतीं सब्जियां

ज़हरीला होता पानी

संगीन होते हालात

बढ़ती महंगाई की मार

ये ना तो किसी फिल्म की कहानी है, ना ही किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा

ये महज शब्दों का बुना हुआ जाल नहीं है ना ही किसी कवि की कोरी कल्पना... ये सच है उस समाज का, जिसका हिस्सा हम हैं, आप हैं... बाहर से भले ही ये दुनिया रंग-बिरंगी दिखे लेकिन इसका खोखलापन बहुत ही कम लोगों को दिखता है... दुनिया के कैनवस पर भले ही ऊपर वाले ने कितने ही रंग भरे हों लेकिन इस रंग बदलती दुनिया में ना कुछ तेरा है ना मेरा है... वाकई इस वक्त तो यही याद आता है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो... मेरे दिमाग में ये ख्याल इस पेंटिंग को देखकर आया जिसमें रंग तो बहुत भरे हैं लेकिन रंगों के बीच छिपी है कलाकार की वो कल्पना जिसमें दिखाई तो सभी दे रहे हैं लेकिन अगल-अलग... ये पेंटिंग मुझे गुगल पर सर्च करते हुए मिली कलाकार का नाम नहीं पता है लेकिन अगर किसी को पता चले तो ज़रूर बताए...

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

बेमिसाल गुरु


गुरुदत्त अगर आज ज़िंदा होते तो अपनी फिल्मों की ताऱीफ में कसीदे गढ़े जाने से खासे खुश होते... अपनी एक-एक फिल्म में उन्होने एक निर्देशन क्षमता की पराकाष्ठा से दुनिया को परिचित कराया... एक साधारण सी कहानी को असाधारण निर्देशन का साथ मिल जाए तो फिल्म खास हो जाती है... गुरुदत्त साहब की फिल्में खास से भी परे थीं क्योंकि उनकी फिल्मों में कलाकारी की अतिशयोक्ति नहीं होती थी, वो किसी बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट की मोहताज नहीं होती थीं, उन्हे तो बस दर्शकों का प्यार पाना होता था और लोगों को ज़िंदगी में एक जगह पाना था... फिल्म प्यासा जिसका निर्देशन भी गुरुदत्त साहब ने किया था और एक्टिंग भी की थी... कहा जाता है कि ये फिल्म उनके दिल के काफी करीब थी... प्यासा फिल्म से उनका काफी लगाव था और फिल्म की कुछ घटनाएं उनके जीवन, उनके दिल के काफी करीब थीं... इस फिल्म के माध्यम से गुरु साहब ने समाज की उस सच्चाई को उजागर करने की कोशिश की जिसके बारे में जानते तो सभी हैं लेकिन अनजान बने रहते हैं... आप लोग शायद मेरा इशारा समझ ही गए होंगे... प्यासा फिल्म में इस बात की झलक देखने को मिलती है कि कैसे किसी का काम उसका भगवान होता है इसमें ना पैसे रुपए की चाहत होती है ना शोहरत की... लेकिन समाज का स्वार्थ कैसे किसी को आगे नहीं बढ़ने देता है, कोई कैसे इस डर में जीता है कि कहीं किसी की लोकप्रियता उसकी कमाई का ज़रिया हा ना बंद कर दे... ये फिल्म कहानी है उस इंसान की जो अपने ही अंतर्द्वंद से लड़ता है और अंत में वो मुकाम हासिल करता है जिसका वो असल हकदार होता है... लेकिन फिल्म अभी बाकी है... दरअसल पूरी फिल्म में गुरुदत्त साहब का किरदार यानि विजय अपनों की चाहतों से जूझता रहा और अंत में अपने लिए इस दुनिया को नाकाफी बताता है... फिल्म का सार कुछ इस तरह है कि अगर यही दुनिया है और अगर ये मिल भी जाए तो क्य़ा हो... कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि गुरुदत्त साहब जैसा शोमैन बॉलीवुड के फिल्म इतिहास में आज तक नहीं आया... लेकिन इस शोमैन की आकस्मिक मौत ने पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज को हिला दिया लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ज़िंदगी में सबकुछ पा लेने के बाद भी किसी ना किसी तरह की रिक्तता शेष रह जाती है.,., गुरुदत्त साहब के बारे में लिखने के लिए कभी वक्त की कमी हो जाती है तो कभी शब्दों की लेकिन आज मैं इस लिजेंड को सैल्यूट कर रहा हूं और एक श्रद्दांजली दे रहा हूं अपने शब्दों के माध्यम से... क्योंकि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का शब्दों से ज्यादा अचूक माध्यम कुछ नहीं होता... हमारे समय के लिए गुरुदत्त साहब भले ही बीते ज़माने की बात हो चुके हैं लेकिन वो आज भी हमारे बीच ज़िंदा हैं अपनी फिल्मों के ज़रिए अपनी एक्टिंग के ज़रिए और अपनी उस मुस्कुराहट के लिए जिसने कभी लाखों दिलों पर राज किया...