दिल्ली
चुनाव 2020 से क्या सीख मिली ?
जीत से
सीख तो हार से सबक मिलता रहा है... खैर सबक तो जीत से मिलता है लेकिन जीतने वाले
को नहीं... यहां दिल्ली चुनाव 2020 के परिणामों के मायने बहुत स्पष्ट हैं... आम
आदमी पार्टी को कुछ सीटों का नुकसान तो हुआ लेकिन ये नुकसान उन्हे सरकार बनाने से
नहीं रोक पाया... इसके इतर बात करें बीजेपी की तो उसे 4 सीटों का तो फायदा हुआ है
लेकिन ये फायदा उनके मनोबल को सींचने के अलावा शायद ही कुछ और कर सका है और ये
सिंचाई भी बहुत कम पानी से हो सकी है... जो अगले 5 साल तक होती रहेगी... लेकिन
विपक्ष के तौर पर बीजेपी को अहम भूमिका निभाते रहते हुए केजरीवाल सरकार के सही और
गलत के बीच के फर्क को समझाते रहना होगा लेकिन अगले पांच साल जितने अहम् केजरीवाल
सरकार के लिए होंगे उतने ही अहम बीजेपी के लिए होंगे,.,., क्योंकि अगले विधानसभा
चुनाव होने हैं बंगाल और बिहार में... बंगाल की ममता सरकार की बात करें तो
विपक्षियों पर वो कतई ममता नहीं दिखाती हैं और वो बंगाल की कठोर सड़क पर पैदल
मार्च करके ही सरकार के कठोर रवैये की बानगी पेश कर देती हैं... यानि बंगाल में
सियासी कीचड़ के अलावा बीजेपी को कठोर और पथरीली राजनीति से भी टकराना होगा...
यानि कमल को खिलाने के लिए यहां पर बीजेपी की कोशिशें धरातल पर मजबूत दिखनी ही
होंगी... बिहार में तो नीतीश सरकार का रवैया किसी से छिपा नहीं है... ऐसे में
सहयोगी को और मजबूत बनाना बीजेपी का पहला लक्ष्य होना चाहिए...
ये बात
तो भविष्य की हुई लेकिन वर्तमान हकीकत की बात करें तो बीजेपी के हाथों से एक-एक कर
राज्यों की सत्ता छिनती जा रही है.. और सरकार बनाना बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर बन
चुका है... याद कीजिए 2014 का वो दौर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार सत्ता
में आए और उससे पहले भारतीय जनता पार्टी सिर्फ 7 राज्यों में सत्ता संभाल रही
थी... लेकिन मार्च 2018 आते-आते बीजेपी ने तेज़ी से राज्यों में कदम बढ़ाए और 21
राज्यों में सरकार बना ली... लेकिन बीजेपी के विजय रथ पर 2018 से ब्रेक लगनी शुरु
हो गई... बीजेपी को उन राज्यों में शिकस्त का सामना करना पड़ा जो उसका गढ़ था जहां
वो अजेय समझी जाती थी... साल 2019 में महाराष्ट्र के नाटकीय सियासी घटनाक्रम में
नतीजे बीजेपी के पक्ष में नहीं रहा... यही हाल झारखंड में रहा बीजेपी के हाथ से
सत्ता फिसल गई... बहरहाल मोदी सरकार को संभलने की ज़रूरत है... साल 2018 विधानसभा
चुनावों में एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को शिकस्त मिली... और दिल्ली
विधानसभा 2020 का चुनावी परिणाम भी खतरे की घंटी है,,,
लेकिन
ऐसे कारणों पर गौर करना बेहद ज़रूरी है कि क्या वजह है कि जिस पार्टी की केंद्र
में बहुमत की सरकार है वो विधानसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर
पा रही है... क्या दूसरी पार्टियों की तैयारियां बीजेपी से ज्यादा अच्छी होती हैं
या फिर केंद्र सरकार के लिए जा रहे ताबड़तोड़ बड़े फैसले ही उसके गले की फांस बन
रहे हैं... सरकार की नीयत और नीति स्पष्ट है लेकिन विपक्षी पार्टियों की नीति और
नीयत स्पष्ट नहीं रही... यहां तक कि महाराष्ट्र में बीजेपी के पुराने साथियों में
से एक रहे शिवसेना की सियासी नीयत भी उनकी नीतियों पर भारी पड़ती दिखी...
दिल्ली
चुनाव के बाद कांग्रेस के पास क्या ?
दिल्ली
विधानसभा चुनाव में बीजेपी का जादू अगर फीका रहा तो कांग्रेस की हालत तो वैसी ही
रही कि तुम क्या लेकर आए थे क्या लेकर जाओगे... मतलब उनकी इतनी बुरी हालत का
ज़िम्मेदारी आखिर कौन है... कमज़ोर नेतृत्व या फिर धरातल पर कार्यकर्ताओं और
नेताओं का सक्रिय ना रहना... इसके अलावा पार्टी के भीतर होने वाली आपसी फूट भी
कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी को वेंटिलेटर पर ले आई है... ज़िम्मेदार सब हैं लेकिन कांग्रेस
में ज़िम्मेदारी ले तो कौन ले... इस बार दिल्ली की सड़कों पर निकलने के बाद पता
चला कि मोदी सरकार से सब खुश तो हैं लेकिन सिर्फ खुश होना ही काफी नहीं रहा बल्कि
खुशी तो बिजली, पानी और शिक्षा में छिपी है... यानि राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय
हावी रहे स्थानी मुद्दे... बीजेपी ने कोशिश तो की मुद्दों राष्ट्रीय हों लेकिन
दिल्ली की जनता ने केजरीवाल सरकार को एक और मौका देने का मन बना लिया था... और जो
संशय की स्थिति में रहे उनका वोट गया बीजेपी को... लेकिन कांग्रेस को लेकर किसी भी
वोटर के मन में कोई संशय नहीं रहा... यानि वोट नहीं दिया गया...
आंकड़ों
की मानें तो साल 2014 में जब बीजेपी सत्तासीन हुई तो उसी के साथ राज्यों में
प्रदर्शन बेहद शानदार रहा... हमारे प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और अमित शाह के
कुशल नेतृत्व ने लोगों का दिल जीत लिया... उसके बाद बीजेपी ने हर उस मुद्दे पर काम
करना शुरु किया जो उनके मेनिफेस्टो में था... विपक्षी की चिंता किए बगैर... लेकिन
विपक्ष तो नाराज़ ही रहा... संसद के भीतर भले ही सरकार के कुछ फैसलों को विपक्ष का
साथ मिलता रहा लेकिन सड़क पर विपक्षी दलों का गुस्सा तो देखते ही बनता था... इस
गुस्से का फायदा भी क्षेत्रीय पार्टियों को खूब मिला लेकिन कांग्रेस इसका फायदा
ज्यादा नहीं उठा सकी... कांग्रेस के पास अब भी वक्त है खुद की बुनियाद को याद करके
पार्टी को मजबूत करने का... तो बीजेपी के पास भी वक्त है अपनी गलतियों से सीखने
का... क्योंकि दुनियाभर में नाम कमाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के
सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही देश की उन सियासी पार्टियों से पार पाने की है जो राजनीति
को एक बिजनेस मानते हैं...