मंगलवार, अगस्त 31, 2010

रुक जाना नहीं तुम....


जब तक है सांस
चलेगा आदमी
रुकेगा नहीं।

सुबह से शाम
शाम से रात
और फिर रात से सुबह तक
बढ़ेगा आदमी
बँधेगा नहीं।

एक धड़कन लिये
सांस को साथी बनाये
ऊँचाइयों की मेहराबों पर
चढेगा आदमी
थमेगा नहीं।

उसके लिये कहीं
न कोई अति है
न कोई समझौता
न तो सहमति है
वह तो जीता है -
एक-एक पल में
उसके लिये तो
सांस ही गति है।

{कृष्ण बिहारी}

वर्तमान परिप्रेक्ष्य के लिए ये कविता बिल्कुल सटीक बैठती है...

रविवार, अगस्त 15, 2010

आज़ादी के मायने



पल-पल बदलते रिश्ते, और रिश्तों की भीड़ में पल-पल बदलते इंसान,
क्या ये है आज़ादी की तस्वीर...
या फिर पल-पल बदलती तस्वीर, और बदलते उनके रंग
क्या ये हैं आज़ादी के रंग
गरीबी हटाने के लिए हटा दिए गए गरीब, या फिर उजाड़ दिए उनके घर...
अगर इन्होने मांगा हक, तो इन्होने नेताओं की आज़ादी के रंग में डाल दिया भंग...
ये है कौन सा ढंग
क्या ये है आज़ादी की सच्चाई
बढ़ती महंगाई, बढ़ते खर्चे, बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता सरदर्द और बढ़ता जीवन का दर्द
इन्हे कम करने के लिए कभी लेते हैं उधार तो कभी लेते हैं कर्ज... इसी, कर्ज के बोझ तले कभी तेज़ तो कभी धीरे, खिंचती जा रही है जिंदगी की रेल
क्या इस आज़ादी से हमारा है कोई मेल
एक दिन सुनते हैं आज़ादी के गीत, और खुश हो जाते हैं कि हम हैं आज़ाद लेकिन अगले ही दिन फिर निकल पड़ते हैं दुनिया को बेवकूफ बनाने और आज़ादी के नाम पर लूट मचाने
क्य़ा ये है आज़ादी या फिर उससे जुड़े असल मायने

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

मेरे अपने ...


अभी हाल ही में मैने फिल्म मेरे अपने देखी... इस फिल्म को 1971 में बनाया गया था जबकि फिल्म के निर्माता थे रामू, राज और एन सी सिप्पी... ये तो बात हुई निर्माताओं की लेकिन फिल्म के सबसे खास पहलू के साथ जुड़ा है एक ऐसा नाम जिसने हिंदी सिनेमा में एक लंबा वक्त गुज़ारा है... यहां बात हो रही है फिल्म के लेखक और निर्देशक गुलज़ार का..गुलज़ार ने एक साधारण सी कहानी को अपने निर्देशन में कुछ यूं पिरोया कि हर किरदार जीवंत हो उठा और छैनू का रोल भी फिल्म और समाज के लिए अहम लगने लगा... हालांकि श्याम की किरदार निभा रहे कलाकार विनोद खन्ना काफी नये थे लेकिन उनका साइकिल पर चश्मा लगाकर चलना उस वक्त के युवाओं के लिए निश्चित तौर पर रोल मॉडल जैसा रहा होगा... लेकिन फिल्म का सबसे कसा हुआ पहलू था मीना कुमारी का बुढ़ापा जिसनें फिल्म में जान फूंक दी... मीना कुमारी भले ही फिल्म में एक कमज़ोर नानी का रोल निभा रही थीं जिनके साथ उन्ही के रिश्तेदारों ने दगा किया लेकिन उनका किरदार और अभिनय उतना ही ताकतवर था...फिल्म में ऐसे भी बहुत से किरदार थे जिन्होने फिल्म को आम से खास बना दिया और फिल्म से जुड़े इतिहास को खासमखास... फिल्म का सुखद पहलू रहा अंतर्द्वंद से जूझते कुछ युवा जो कम से कम एक बूढ़िया की इज्जत करना जानते थे... मीना कुमारी के किरदार ने हर किसी को अपना बना लिया सिवाय अपने ही रिश्तेदारों के... उनकी सीख आज के समय में भी बिल्कुल सही बैठती है क्योंकि आज के दौर में रिश्तेदार होना अपनेपन की निशानी नहीं है... हालांकि फिल्म के अंत में मीना कुमारी को गोली लग जाती है और वो स्वर्ग की यात्रा पर निकल जाती हैं लेकिन जाते-जाते वो सीख दे जाती हैं कि प्यार निभाने के लिए दिल में प्यार के साथ-साथ सच्चाई को होना भी ज़रूरी है... फिल्म भले ही चालीस साल पुरानी हो चुकी है लेकिन उसकी सीख कभी पुरानी नहीं पड़ेगी...