लेनिन से ज्यादा प्रचलित लेनिनवाद रहा है... दरअसल लेनिनवाद एक विचारधारा है... और शायद इसीलिए अब तक जीवित है... लेकिन इस बार लेनिनवाद से ज्यादा चर्चा में रही लेनिन की एक मूर्ति जो त्रिपुरा में ढहा दी गई... सिर्फ ढहाई ही नहीं गई बल्कि बेहद आक्रामक तरीके से बुलडोज़र से इस मूर्ति को ढहा दिया गया... मूर्ति को गिराने की जो तस्वीरें सामने आईं... वो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के एक हिस्से की तस्वीर है... इस हकीकत पर थोड़ा यकीन कर पाना मुश्किल है... लेकिन यक़ीन मानिए ये तस्वीरें असली हैं... एक पार्टी इस हिंसा को कतई स्वीकर करने के लिए तैयार नहीं है और एक पार्टी इस हिंसा को त्वरित प्रतिक्रिया तो बता रही है लेकिन इसकी मज़म्मत करने को तैयार नहीं... लेकिन सवाल ये है कि क्या हम इस हिंसात्मक प्रतिक्रिया को जायज़ मानने के लिए तैयार हैं... मानने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि ये अभी झांकी है त्रिपुरा की सियासत की पूरी फिल्म अभी बाकी है... जो पिछले 25 बरस में नहीं हुआ वो अब होगा... ये डॉयलॉग मशहूर फिल्म 'दीवार' में सुना गया था लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के लिए बिल्कुल सटीक बैठता है... पिछले 25 सालों से त्रिपुरा की सत्ता में लेफ्ट का दबदबा था... लेकिन अब लेफ्ट को सत्ता से बेदखल कर सत्ता की कुर्सी पर बीजेपी काबिज़ हो चुकी है... राष्ट्रीय राजनीति में त्रिपुरा का ज़िक्र बहुत कम होता रहा है लेकिन बीजेपी ने त्रिपुरा की सियासत को पहले राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया और आज त्रिपुरा का मसला, चाहे वो सियासी मसला हो या फिर हिंसात्मक मसला... राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल्स पर बहस का विषय बन रहे हैं... लेफ्ट का कहना है कि लेनिन को भगत सिंह भी मानते थे और बापू को इनसे प्यार था... तो सवाल ये भी उठता है कि हमारे देश के क्रांतिकारियों की प्रतिमा भी तो लगाई जा सकती थी... इस सवाल का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है...
अब लेनिन का एक संक्षिप्त परिचय...
व्लादिमीर लेनिन मार्क्सवादी विचारक थे और इनके नेतृत्तव में 1917 में रूस में क्रांति हुई... जन्म 22 अप्रैल को रूस के सिंविर्क्स शहर में हुआ था... साल था 1870... 1889 में मार्क्सवादियों का संगठन बनाकर इसके नेता बने... साम्यवादी शासन के लिए आंदोलन चलाया... कई बार जेल गए... कई किताबें लिखीं... लेनिन को पढ़ने वालों ने एक क्रांतिकारी के तौर पर लेनिन को पहचाना है लेकिन लेनिन के बारे में ये भी प्रचलित बात है कि वो हिंसा को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रैक्टिकल भी था...54 साल की उम्र में 1924 में स्ट्रोक की वजह से लेनिन का निधन हुआ लेकिन अंतिम संस्कार ना कर लेनिन के शव को रूस में संरक्षित कर लिया गया... खैर लेनिन अब हमारे बीच नहीं है लेकिन अब लेनिन की एक मूर्ति को भारत में गिराया जाना और फिर उसे लेकर सियासी पार्टियों के बीच घमासान मचना ये दर्शाता है कि लेनिनवाद अब भी ज़िंदा है... किसी के विचारों में तस्वीरों में, मूर्तियों और किताबों में...लेनिनवाद प्रैक्टिकल है या फिर नहीं... फैसला आपका है... लेकिन हां आज की पीढ़ी को इसी बहाने एक बार फिर से लेनिन को जानने का मौका मिल गया है...

