सोमवार, जुलाई 12, 2010

रंग बदलती दुनिया


संदिग्ध होता मौसम

जानलेवा होतीं सब्जियां

ज़हरीला होता पानी

संगीन होते हालात

बढ़ती महंगाई की मार

ये ना तो किसी फिल्म की कहानी है, ना ही किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा

ये महज शब्दों का बुना हुआ जाल नहीं है ना ही किसी कवि की कोरी कल्पना... ये सच है उस समाज का, जिसका हिस्सा हम हैं, आप हैं... बाहर से भले ही ये दुनिया रंग-बिरंगी दिखे लेकिन इसका खोखलापन बहुत ही कम लोगों को दिखता है... दुनिया के कैनवस पर भले ही ऊपर वाले ने कितने ही रंग भरे हों लेकिन इस रंग बदलती दुनिया में ना कुछ तेरा है ना मेरा है... वाकई इस वक्त तो यही याद आता है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो... मेरे दिमाग में ये ख्याल इस पेंटिंग को देखकर आया जिसमें रंग तो बहुत भरे हैं लेकिन रंगों के बीच छिपी है कलाकार की वो कल्पना जिसमें दिखाई तो सभी दे रहे हैं लेकिन अगल-अलग... ये पेंटिंग मुझे गुगल पर सर्च करते हुए मिली कलाकार का नाम नहीं पता है लेकिन अगर किसी को पता चले तो ज़रूर बताए...

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