शनिवार, अक्टूबर 16, 2010

दशहरे के दिन


दशहरा को मनाया जाता है अच्छाई की बुराई पर जीत के रुप में... ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने रावण को मारकर धर्म की जीत सुनिश्चित की थी... आज के दौर में इस त्योहार के मायने काफी हद तक बदल गए हैं... आधुनिकता का दम भरने वाले लोग रावण के पुतले को बेदम होता देखना तो चाहते हैं लेकिन बिल्कुल अलग अंदाज में... अब रावण के पुतले पहले से ज्यादा रंग-बिरंगे होते जा रहे हैं उनपर भी इक्कसवीं सदी की टेक्नोलॉजी का भरपूर प्रयोग होता दिख रहा है... आपको याद होगा कि दशहरे के दिन लगने वाले मेले को लेकर लोगों में खासा उत्साह रहा करता था... खासकर घर के बच्चों को इस दिन पिताजी की ओर से कुछ पैसे दिए जाते थे ताकि वो मेले में जाएं और अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीद सकें... लेकिन मॉल कल्चर ने लोगों से मेले का उत्साह छीन लिया है... क्योंकि अब लोगों को खुशी मिलती है बाज़ारवाद का हिस्सा बनने में... लोगों को संतुष्टि मिलती है असंतुष्टि में क्योंकि आज का बाज़ारवाद यही कहता है कि आखिर क्यों संतुष्ट हैं आप... हर बार की तरह इस बार भी दशहरे के दिन रावण को जला दिया जाएगा... लेकिन धीरे-धीरे वो पुराना उत्साह कहीं गुम होता नज़र आ रहा है...मुझे याद है कि आज भी संगम नगरी इलाहाबाद की गलियों में ऐसी-ऐसी झांकियां निकाली जाती हैं जिनको देखकर आपको कलाकारों की मेहनत और उनके विजन का पता चल जाएगा... लेकिन मैट्रो शहरों के संदर्भ में ये बातें बेमानी सी मालूम होती हैं... इस बार भी दशहरे की छुट्टियों में लोग मेले में कम और मॉल्स में ज्यादा नज़र आ रहे हैं... इस पूरे हफ्ते जगह-जगह भले ही रामलीला के कलाकारों का आवाज खूब गूंजती रही लेकिन स्टेज से उतरने के बाद यही कलाकार अपनी एक अदद पहचान के लिए आज भी जूझ रहे हैं... क्योंकि धीरे-धीरे ही सही लोग कहीं ना कहीं उस मानसिकता के गुलाम होते जा रहे हैं... जो उन्हे अपनी पुरानी संस्कृति से दूर और खोखली पश्चिमी सभ्यता के करीब लाती जा रहे है...

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