शनिवार, दिसंबर 22, 2012

कभी हंस भी लिया करो !


अपनी जिंदगी में ऐसे बहुत से लोगों से मुलाकात होती है जो या तो बहुत ज्यादा हंसते हैं... या फिर बिल्कुल नहीं हंसते हैं... कुछ ऐसे होते हैं जो हंसना चाहते हैं लेकिन बड़प्पन का मुल्लमा उन्हे खुलकर हंसने नहीं देता... कुछ के अधरों पर मुस्कान भी आ जाती है लेकिन कुछ खास अवसरों पर... क्या आपको याद है कि अंतिम बार आप ठहाके लगाकर कब हंसे थे... शायद नहीं... अगर याद भी है तो शायद दुबारा वैसा हंसने के लिए अभ्यास करना पड़े क्योंकि ज़िंदगी की भागदौड़ में ऐसा बहुत ही कम वक्त मिल पाता है जब आप खुलकर हंसते हैं क्योंकि ठहाकों की आवाज छिप गई है गाड़ियों के शोर में औप पैसों की खनखनाहट में... थोड़ी बहुत आशा बची थी अपनों से तो वो भी अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है... क्योंकि अपनों से मुलाकात का वक्त नहीं है अगर वक्त है तो फिर मन करता है कि थोड़ा आराम कर लें क्योंकि दूसरे दिन फिर शामिल हो जाना है दुनिया की भेड़चाल में और साबित करना है खुद की चाल को दूसरों की चाल से तेज़... समय की कमीं और ठहाके वाली हंसी के बारे में लिखा और पढ़ा बहुत से लोगों ने है लेकिन फिर भी ना जाने दिल क्यूं ये चाहता है कि हफ्ते के एक दिन इस बारे में ज़रूर सोचा जाए... या फिर समय की कमीं हो तो महीने में नहीं तो साल के अंत में तो सोच ही सकते हैं... खैर देर आये दुरुस्त आये मैने भी इस बारे में सोच ही लिया कि मैं अंतिम बार खुलकर कब हंसा था... थोड़ा मुस्करा कर ज़िंदगी की मुश्किलों का सामना करने का दावा करने वालों को शायद ये नहीं पता कि मुश्किलें मुस्कुराने से नहीं बल्कि भागती हैं आपकी ठहाकों की आवाज से... मुश्किलें डरती हैं आपकी खनकती हंसी से... मुश्किलें हिम्मत ही नहीं जुटा पाती हैं उन लोगों के सामने आने की जो हंसना जानते हैं ठहाके लगाकर दुनिया को ये बताना जानते हैं कि कितनी भी मुश्किलें आयें हम हंसना नहीं छोड़ेंगे... कितनी ही रुकावटे आएं हम नहीं टूटेंगे क्योंकि जिंदगी एक ही है जिसमें मुश्किलें तो जिंदगी का स्वाद बढ़ाती हैं... आपलोग भी शायद मेरे विचारों से इत्तफाक रखते होंगे...?

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