पत्रकारिता की कक्षाओं में अक्सर मीडिया ethics
की बातें हुआ करती थीं... लेकिन पत्रकारिता जगत में ये बातें बेमानी ही
साबित हो जाती हैं क्योंकि हम चाहते हैं करना कुछ और, लिखना कुछ और लेकिन करते कुछ
और हैं लिखते वही हैं जो बिक सके... दरअसल मीडिया जगत में बाज़ारबाद आपके जज्बे पर
भारी पड़ जाता है... असल में बाज़ारवाद सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं बल्कि हर जगह
हावी है, हकीकत ये है कि जितना आपका हौसला टूटेगा, बाज़ारवाद उतना ही शक्तिशाली होगा...
आपको ये गलत-फहमी तो हो सकती है कि शायद काम अच्छा हो रहा है लेकिन जैसे-जैसे आपकी
समझ बड़ेगी बाज़ारवाद का स्याह पक्ष से आप रूबरू हो जाएंगे... ये सच्चाई है... इसे
नकार नहीं सकते महज तमाशबीन बनकर हमारी हालत उस सपेरे की तरह हो गई है तो बीन
बजाते हुए ये सोचता है कि सांप आपकी बीन पर नाच रहा है लेकिन सच्चाई तो दुनिया को
पता है...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें