
जब तक है सांस
चलेगा आदमी
रुकेगा नहीं।
सुबह से शाम
शाम से रात
और फिर रात से सुबह तक
बढ़ेगा आदमी
बँधेगा नहीं।
एक धड़कन लिये
सांस को साथी बनाये
ऊँचाइयों की मेहराबों पर
चढेगा आदमी
थमेगा नहीं।
उसके लिये कहीं
न कोई अति है
न कोई समझौता
न तो सहमति है
वह तो जीता है -
एक-एक पल में
उसके लिये तो
सांस ही गति है।
{कृष्ण बिहारी}
वर्तमान परिप्रेक्ष्य के लिए ये कविता बिल्कुल सटीक बैठती है...
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