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अभी हाल ही में मैने फिल्म मेरे अपने देखी... इस फिल्म को 1971 में बनाया गया था जबकि फिल्म के निर्माता थे रामू, राज और एन सी सिप्पी... ये तो बात हुई निर्माताओं की लेकिन फिल्म के सबसे खास पहलू के साथ जुड़ा है एक ऐसा नाम जिसने हिंदी सिनेमा में एक लंबा वक्त गुज़ारा है... यहां बात हो रही है फिल्म के लेखक और निर्देशक गुलज़ार का..गुलज़ार ने एक साधारण सी कहानी को अपने निर्देशन में कुछ यूं पिरोया कि हर किरदार जीवंत हो उठा और छैनू का रोल भी फिल्म और समाज के लिए अहम लगने लगा... हालांकि श्याम की किरदार निभा रहे कलाकार विनोद खन्ना काफी नये थे लेकिन उनका साइकिल पर चश्मा लगाकर चलना उस वक्त के युवाओं के लिए निश्चित तौर पर रोल मॉडल जैसा रहा होगा... लेकिन फिल्म का सबसे कसा हुआ पहलू था मीना कुमारी का बुढ़ापा जिसनें फिल्म में जान फूंक दी... मीना कुमारी भले ही फिल्म में एक कमज़ोर नानी का रोल निभा रही थीं जिनके साथ उन्ही के रिश्तेदारों ने दगा किया लेकिन उनका किरदार और अभिनय उतना ही ताकतवर था...फिल्म में ऐसे भी बहुत से किरदार थे जिन्होने फिल्म को आम से खास बना दिया और फिल्म से जुड़े इतिहास को खासमखास... फिल्म का सुखद पहलू रहा अंतर्द्वंद से जूझते कुछ युवा जो कम से कम एक बूढ़िया की इज्जत करना जानते थे... मीना कुमारी के किरदार ने हर किसी को अपना बना लिया सिवाय अपने ही रिश्तेदारों के... उनकी सीख आज के समय में भी बिल्कुल सही बैठती है क्योंकि आज के दौर में रिश्तेदार होना अपनेपन की निशानी नहीं है... हालांकि फिल्म के अंत में मीना कुमारी को गोली लग जाती है और वो स्वर्ग की यात्रा पर निकल जाती हैं लेकिन जाते-जाते वो सीख दे जाती हैं कि प्यार निभाने के लिए दिल में प्यार के साथ-साथ सच्चाई को होना भी ज़रूरी है... फिल्म भले ही चालीस साल पुरानी हो चुकी है लेकिन उसकी सीख कभी पुरानी नहीं पड़ेगी...
बहुत सुंदर...सरस...शब्दों में कहीं-कहीं कुछ विचलन...उसे ठीक ज़रूर रखें. याद आ गई मेरे अपने...
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