रविवार, अगस्त 15, 2010

आज़ादी के मायने



पल-पल बदलते रिश्ते, और रिश्तों की भीड़ में पल-पल बदलते इंसान,
क्या ये है आज़ादी की तस्वीर...
या फिर पल-पल बदलती तस्वीर, और बदलते उनके रंग
क्या ये हैं आज़ादी के रंग
गरीबी हटाने के लिए हटा दिए गए गरीब, या फिर उजाड़ दिए उनके घर...
अगर इन्होने मांगा हक, तो इन्होने नेताओं की आज़ादी के रंग में डाल दिया भंग...
ये है कौन सा ढंग
क्या ये है आज़ादी की सच्चाई
बढ़ती महंगाई, बढ़ते खर्चे, बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता सरदर्द और बढ़ता जीवन का दर्द
इन्हे कम करने के लिए कभी लेते हैं उधार तो कभी लेते हैं कर्ज... इसी, कर्ज के बोझ तले कभी तेज़ तो कभी धीरे, खिंचती जा रही है जिंदगी की रेल
क्या इस आज़ादी से हमारा है कोई मेल
एक दिन सुनते हैं आज़ादी के गीत, और खुश हो जाते हैं कि हम हैं आज़ाद लेकिन अगले ही दिन फिर निकल पड़ते हैं दुनिया को बेवकूफ बनाने और आज़ादी के नाम पर लूट मचाने
क्य़ा ये है आज़ादी या फिर उससे जुड़े असल मायने

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