राजनीति के तेल में कभी पकौड़े तले जा रहे
हैं कभी छोले-भटूरे... पकौड़े तलना रोज़गार का ही स्वरूप बताया गया है, तो छोले-भटूरे खाकर सांकेतिक तौर पर
उपवास रखा गया... इन दोनों ही मामलों पर सियासत खूब गरमाई... गर्मा गर्म पकौड़ों की
तरह... कभी विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा तो सरकार ने विपक्षी पार्टियों को तीखे
आरोपों के तीर से छलनी करने की कोशिश हुई... विपक्ष छलनी हुआ या नहीं लेकिन ये तो
तय है कि इन सब आरोप-प्रत्यारोप की बौछार के बीच जनता ज़रूर छली गई... जिस देश में
लोकतंत्र की दुहाई देते-देते जनता से वोटों का जुगाड़ कर लिया जाता है उसी देश में
लोकतंत्र के नाम जनता की ज़रूरतों की अनदेखी भी की जाती है... ये हकीकत है कि
मौजूदा हालात में राजनीति उस दिशा की ओर चल पड़ी है... जहां पर शब्दों की मर्यादा
इतनी गिरा दी जाती है कि दूसरी पार्टियां इन्ही शब्दों को पिरोकर घातक सियासी
हथियार तैयार कर लेते हैं... और समय-समय पर ब्रह्मास्त्र की तरह इसका दूसरी
पार्टियों पर इस्तेमाल भी कर लेते हैं... आज की राजनीति में शब्दों की मर्यादा और
गरिमा ऐसे स्तर पहुंच चुकी है कि तमाम पार्टियों की तुलना जानवरों से कर दी जाती है...
स्तर इतना नीचे गिरेगा इसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा... खासकर उस जनता
ने जो ये मानकर चलती है कि किसी को जानवर कहना गाली देने जैसा है... खैर जनता
जनार्दन की अदालत में सभी को आना है और फैसला जनता को करना है...

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