बेटियां, बेड़ियां और बंदिशें...
अब आप सोच रहे होंगे कि बंदिशें और बेड़ियों के साथ सिर्फ बेटियों का
ज़िक्र क्यों किया... दरअसल बेटों के लिए तो ना तो बंदिशें हैं और ना हीं उनके लिए
कोई बेड़ियां मायने रखती हैं... ये हमारे समाज की असल मानसिकता है... दावे लाख किए
जाएं कि अब सारे शब्दों का इस्तेमाल आप बेटों के साथ भी कर सकते हैं और बेटियों के
साथ भी... लेकिन क्या वाकई ये संभव हो पाया है... क्या वाकई हम बेटियों को समाज
में वो सुरक्षित माहौल दे पाएं हैं जिसकी वो हकदार हैं... दुष्कर्म की हर घटना के
बाद हमारी रूह कांप उठती है... रेप की हर वारदात को सुनने के बाद हमारे गुस्से का
उफान कभी टीवी चैनल्स पर दिखता तो कभी सड़कों पर नारेबाज़ी और प्रदर्शन के रुप
में... लेकिन क्या माहौल बदलने लगा है... क्या वाकई ऐसी वारदातों का कभी अंत हो
सकेगा... क्या कभी ऐसा मुक्कमल वक्त आ सकेगा और हम कह सकेंगे कि मुश्किलें कम हुईं
हैं और माहौल पूरी तरह से सुरक्षित हो गया है...
बिंदास, बेबाक और बेखौफ बेटियां...
खैर बेटियों को लेकर एक निराशाजनक शब्दों के साथ तो मैने शुरुआत कर दी
लेकिन इसी समाज की तमाम बेटियां आज सशक्त हैं... वो बिंदास हैं, बेबाक हैं और
बेखौफ भी... ये ना तो समाज की बंदिशों को मानती हैं और ना ही किसी तरह की समाजिक
वर्जनाओं को जो इन्हे हाशिए पर लाती हैं... आज अत्याचार के खिलाफ ये महिलाएं सड़क
पर उतरकर महिलाओं के साथ-साथ उन उन पुरुषों को भी जागरुक करने की मुहिम में जुटी
हैं जो महिला सशक्तिकरण पर होने वाली बहस का हिस्सा तो होते हैं लेकिन जब कुछ करने
का वक्त आता है तो अपने पैर पीछे खींच लेते हैं... देश के मौजूदा हालातों का
ज़िक्र करें तो बच्चियों के खिलाफ हुईं कई क्रूर हिंसाओं ने उन बहानों को पीछे
धकेल दिया है जिनके नाम पर अपराधियों की मानसिक स्थिति का विश्लेषण किया जाता रहा
है... बच्चियों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा में किसी भी तरह की माफी की संभावना
ही नहीं बनती... अपराधियों की पहचान होते ही उन्हे ऐसी सजा दी जाए जो ऐसे मामलों
में अपराधियों के लिए सबक बने और समाज के लिए नज़ीर...

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